Archive for the ‘Indian Youth and Corruption’ Category

                                                    Abstract

Religion is a deriving force for social change in India since ancient times. Although we boast about ancient Indian ideals of social stratification, which made a long lasting discrimination within society, and most of the times we do not do any justice to social-political life of a billion peoples. The study of the relation between religion and politics showed that this relation always made a problematic situation for the indigenous people and always benefitted invaders. The idea of the interface or mixing of religion and politics being problematic and potentially dangerous is a byproduct of the rise of secularism, often regarded as one of the hallmarks of modern society. The concept of social justice is an important concept for the social-political harmony in present times. Social justice denotes the equal treatment of all citizens without any social distinction based on caste, colour, race, religion, sex and so on. It means absence of privileges being extended to any particular section of the society, and improvement in the conditions of backward classes (SCs, STs, and OBCs) and women. Social justice is a public and collective good that involves an equitable sharing of the earth’s power, resources and opportunities to enable people individually and collectively to develop their talents to the fullest. Its realisation requires social relations embedded in trust, acceptance, mutuality, reciprocity and solidarity. Under Indian Constitution the use of social justice is accepted in wider sense, which includes social and economical justice both. Ancient social structure allows us to see the discrimination made to indigenous people with reference to their socio-political life. These evils not only effects Hindu social order rather it also haunts the social structure of newly established religions in Indian continent. The objective of this paper is to disuses the role of religions in imparting social justice to Indian socio-political structure of our society. First we will see the place of religion in society then sees its effect on socio-political order whether it is affirmative or negative which allow us to make any rational conclusion.

Key-Words: Religion, Indian Society, Social Justice, Social Inclusion and Indian Constitution

Note:

To be presented at National Seminar on Social Security and Social Inclusion for Inclusive Growth in India,  PG Department of Economics and PG Department of Sociology, PGGCG-11, Chandigarh to be held on 5th August 2016.

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भारत देश एक ऐसा देश बनता जा रहा है जो कागजों में तो लोकतान्त्रिक देश कहलाता है पर वास्तविकता देखे तो कुछ और ही नजारा हमारे सामने दीखता है . कुछ तथ्य देखें :

पिछले कुछ वर्षों से लगातार इन मुद्दो पे बातचीत हो रही और वर्तमान सरकार बेशर्म और नपुसंक बनकर जनता का शोषण रही है . नेता लगातार घोटाले करते जा रहे हैं और राष्ट्रविकास का दंभ भर रहे है।

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जब बात आती है युवा और भ्रष्ट्राचार की आती है तो एक अलग समस्या पैदा हो जाती है. आज के शिक्षा की गुणवता के गिरते स्तर के कारण बहुत से नकारात्मक परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं :

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•शिक्षार्थी दिन प्रतिदिन गम्भीर पठन -पाठन से दूर होते जा रहे हैं और कम मेहनत वाले तरीके अपनाने की कोसिस करते हैं
•उपरोक्त दृष्टिकोण के कारण समाज के प्रति सम्वेदना कम होंती जा रही है। युवाओं के आदर्श जीरो फिगर और पिज़ा संस्कृति बनते जा रहे है. अपने सुख के अलावा उन्हें कुछ हर और नही सूजता .
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•सरकार ने भी इसमें कमी नही छोड़ी। मानविकी और सामाजिक विज्ञानं के विषयों की बजाये विज्ञान और वाणिज्य जैसे विषयों पर ही जोर दिया जा रहा है ताकि इनके संस्थानों के लिए अच्छा पैसा बन सके
•चाहे वो दाखिलों के जरियों हो या नौकरियों के लिए रिश्वतखोरी हो.
•दूसरी बात यह हैं की इन विषयों के प्रचार प्रसार में जो व्यय होता हैं, वो सारा जनता का है पर जब ये पढ़ लिख जाते हैं तो सामाजिक सरोकारों से अलग हो जाते है .
•जितने भी बड़े बड़े सरकारी संस्थानों में ये शिक्षा दी जाती हैं वह के विद्यार्थी ज्यादातर अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों में जॉब करते हैं या विदेश में चले जाते हैं
•इससे बड़ा और दुर्भाग्य क्या हो सकता है की जनता का पैसा इस तरह खर्च होता है .
•इनमे से ही बहुत से लोग फिर इन नेताओं की जी हजुरी करते हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त होते है.
•जब युवा नौकरी के लिए जाते हैं तो इन्ही नेताओ के पैरों में पड़ते हैं और इसके लिए हर तरह की बेईमानी करते करते है।
•जो लोग इस तरह से जॉब लेते हैं वे ही अपने दिए पैसे पुरे करने के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं .
अगर भारत का युवा इस तरह की बेईमानी को न अपनाये और समाज के प्रति अपनी जिम्मेवारी समझे तो समाज में शांति और सुरक्षा का माहौल बनेगा। नही तो इन्ही नेताओ के साये में जी रहे गुनाहगार इसी तरह हमारे समाज को खराब करते रहेंगे .

राजनितिक नेता, धर्म के ठेकेदार और भ्रष्ट युवा ही हमारे समाज को हानि पहुंचा रहे है .

जय भीम जय भारत

डॉ देशराज सिरसवाल