भारतीय राजनीति और दलित समस्याएँ

Posted: अप्रैल 25, 2014 in Dalit Liberation, Dalit Studies, Dr. B.R.ambedkar
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दलित शब्द आज भारत में मनोरंजन का एक बहुत अच्छा साधन बन गया है। चाहे मीडिया हो या राजनितिक पार्टीज। लेकिन दलितों का अपना कोई रुझान नहीं है। राजनितिक पार्टियाँ चाहे कांग्रेस हो या बीएसपी सभी इसे अपना वोट बैंक मात्र समझती हैं। और हमारे लोग इनके लिए मरने मारने पर तुले हैं। लेकिन कभी अपने अधिकारों के लिए लड़ नहीं सकते। शर्म आनी चाहिए उन दलित राजनितिक नेताओं को जो इन लोगों का सौदा करते हैं। ये लोग मर रहे हैं। जलाये जा रहे हैं। बलात्कार हो रहे है। लेकिन इन नेताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। दूसरों से क्या उमीद रखे जब अपने ही हरामी हो रहे है। हर पार्टी में ऐसे लोग हैं जो दलितों के नाम पर खा रहे हैं। बाबा साहिब का नाम लेकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। अगर आज नहीं हम सुधरे तो ये हमे ऐसे ही जानवरों के आगे नोचने के लिए छोड़ देंगे।
सबसे बड़ी समस्या तो यह है की दलितों ने अपने आप को पूर्वाग्रहों से ग्रसित क्र रखा जोकि उसे अपने जीवन के लिए संघर्ष करने से भी रोकते हैं.  कितने भी अत्याचार उन पर हो जाएँ उनकी अमूक राजनितिक पार्टी से मोह भंग नहीं होता . कहीं वो अपनी जाति के नाम पर बिक रहे है कहीं थोड़े से पैसे के लिए. अगर उन्हें वास्तव में विकास करना है तो उन्हें इस सच्चाई को जानना पड़ेगा कि बिना किसी लोभ के अपने बच्चों के भविष्य के लिए जातिवादी और धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध लड़ना पड़ेगा. अपने मतों ऑफ़ विश्वासों को बुद्धि की कसौटी पर परखना होगा . यदि वह एसा नहीं क्र पाते तो राजनीतिज्ञ और धर्म गुरु उन्हें मुर्ख बनाकर दासता के बन्धन में बांधे रखेंगे .
यहाँ पर एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उभर क्र आता है की जो लोग शिक्षित हो गये है , बाबा साहेब द्वारा दी गयी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं क्या उनका कोई फर्ज़ नहीं बनता इस समाज को दासता और शोषण से उभरने के लिए ? इसका जवाब बस एक ही है की केवल एक व्यक्ति और एक परिवार के सम्पन्न होने से सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती . जब तक समाज पिछड़ा है. उसका शोषण हो रहा है , जाति के नाम पर अत्याचार हो रहा है , तब तक कोई भी दलित चाहे प्रथम श्रेणी ऑफिसर बन जाये या आर्थिक रूप से सम्पन्न हो जाये . वह कहीं भी सुरक्षित नहीं रह सकता. गोहाना कांड , मिर्चपुर कांड और अन्य बहुत से घटनाएँ लगातार घटती रहेंगीं .इसलिए हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता परिस्थिति का सही विश्लेषण करने की है और एक साथ होकर संघर्ष करने की है .
हमारा समाज अभी बहुत पीछे है और उसको संवारने का भर भी पढ़े लिखों और युवाओं को लेना होगा नही तो बाबा साहेब के संघर्ष को हम बेकार करने का सबसे बड़ा साधन बन रहे हैं और शोषण करने वालों को एक और मौका दे रहे हैं .
जय भीम  जय भारत
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टिप्पणियाँ
  1. […] Filed under: Dalit Issues,Dr Ambedkar — Milestone Education Society (Regd.) Pehowa @ 3:51 अपराह्न दलित शब्द आज भारत में मनोरंजन का एक बहुत अच्छा साधन बन गया है। चाहे मीडिया हो या राजनितिक पार्टीज। लेकिन दलितों का अपना कोई रुझान नहीं है। राजनितिक पार्टियाँ चाहे कांग्रेस हो या बीएसपी सभी इसे अपना वोट बैंक मात्र समझती हैं। और हमारे लोग इनके लिए मरने मारने पर तुले हैं। लेकिन कभी अपने अधिकारों के लिए लड़ नहीं सकते। शर्म आनी चाहिए उन दलित राजनितिक नेताओं को जो इन लोगों का सौदा करते हैं। ये लोग मर रहे हैं। जलाये जा रहे हैं। बलात्कार हो रहे है। लेकिन इन नेताओं के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। दूसरों से क्या उमीद रखे जब अपने ही हरामी हो रहे है। हर पार्टी में ऐसे लोग हैं जो दलितों के नाम पर खा रहे हैं। बाबा साहिब का नाम लेकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। अगर आज नहीं हम सुधरे तो ये हमे ऐसे ही जानवरों के आगे नोचने के लिए छोड़ देंगे। सबसे बड़ी समस्या तो यह है की दलितों ने अपने आप को पूर्वाग्रहों से ग्रसित क्र रखा जोकि उसे अपने जीवन के लिए संघर्ष करने से भी रोकते हैं.  कितने भी अत्याचार उन पर हो जाएँ उनकी अमूक राजनितिक पार्टी से मोह भंग नहीं होता . कहीं वो अपनी जाति के नाम पर बिक रहे है कहीं थोड़े से पैसे के लिए. अगर उन्हें वास्तव में विकास करना है तो उन्हें इस सच्चाई को जानना पड़ेगा कि बिना किसी लोभ के अपने बच्चों के भविष्य के लिए जातिवादी और धार्मिक संस्थाओं के विरुद्ध लड़ना पड़ेगा. अपने मतों ऑफ़ विश्वासों को बुद्धि की कसौटी पर परखना होगा . यदि वह एसा नहीं क्र पाते तो राजनीतिज्ञ और धर्म गुरु उन्हें मुर्ख बनाकर दासता के बन्धन में बांधे रखेंगे . यहाँ पर एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न उभर क्र आता है की जो लोग शिक्षित हो गये है , बाबा साहेब द्वारा दी गयी सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं क्या उनका कोई फर्ज़ नहीं बनता इस समाज को दासता और शोषण से उभरने के लिए ? इसका जवाब बस एक ही है की केवल एक व्यक्ति और एक परिवार के सम्पन्न होने से सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती . जब तक समाज पिछड़ा है. उसका शोषण हो रहा है , जाति के नाम पर अत्याचार हो रहा है , तब तक कोई भी दलित चाहे प्रथम श्रेणी ऑफिसर बन जाये या आर्थिक रूप से सम्पन्न हो जाये . वह कहीं भी सुरक्षित नहीं रह सकता. गोहाना कांड , मिर्चपुर कांड और अन्य बहुत से घटनाएँ लगातार घटती रहेंगीं .इसलिए हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता परिस्थिति का सही विश्लेषण करने की है और एक साथ होकर संघर्ष करने की है . हमारा समाज अभी बहुत पीछे है और उसको संवारने का भर भी पढ़े लिखों और युवाओं को लेना होगा नही तो बाबा साहेब के संघर्ष को हम बेकार करने का सबसे बड़ा साधन बन रहे हैं और शोषण करने वालों को एक और मौका दे रहे हैं . जय भीम  जय भारत भारतीय राजनीति और दलित समस्याएँ […]

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