गुजरातः बिकती औरत, कुचलता दलित: Gajendra Singh Jatav

Posted: अक्टूबर 1, 2013 in Dalits in Gujrat

2004021405110501

गुजरातः बिकती औरत, कुचलता दलित:-
By Gajendra Singh Jatav

पूरे देश के लिए अनुकरणीय विकास मॉडल होने का दावा करने वाले गुजरात में दक्षिणी आदिवासी जिला है नर्मदा. तेल के ले मशहूर इसके अंकलेश्वर से 50 किलोमीटर पर मौजूद है डेडियापाड़ा ब्लॉक. मक्खन जैसी इस सड़क पर सफर करने वालों को पता नहीं चलता कि इसके मुहाने पर एक नरक बसता है. सड़क किनारे बांस और सागा की लकड़ी के मिट्टी से लिपे और नली की छत से बने झोंपड़े दिखाई पड़ते हैं. जहां दक्षिणी और उत्तरी गुजरात के अनेक जिलों की तरह लड़कियां बिकती हैं. राज्य और बाहर हरियाणा तक कम लिंग अनुपात वाले शक्तिशाली समुदायों के लड़कों की गृहदासी पत्नियां बनने के लिए या जिस्म की मंडियों के लिए. उत्तरी गुजरात के मेहसाणा जिले की ऐसी शोषित लड़कियां हमें हरियाणा के मेवात जिले में मिली थीं. दक्षिण गुजरात में भी गरीबी की मारी लड़कियों के साथ भी यही हो रहा है. यहां उत्तर भारत के राज्यो की तरह जातिवाद की जड़ें इतनी मजबूत है कि लोग पत्रकार से भी उसकी जाति पूछकर बात करते हैं. जाति और आय पिरामिड के तल में आदिवासियों के साथ दलित भी हैं जो उच्च जादतियों के हाथ पिटने और भेदभाव झेलने को मजबूर हैं. यहां तक कि खुद गुजरात सरकार प्रायोजित एक अध्ययन में छुआछूत की गहरी जड़ें साबित हुई हैं औऱ समाज में वैमनस्य फैलने के डर से सरकार ने इस अध्ययन के नतीजे सार्वजनिक नहीं किए. सरकार ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में यह अध्ययन कराने की बात मानी है और यह भी माना है कि इसके नतीजे सार्वजनिक हिए तो सामाजिक समरसता पर असर पड़ेगा.

डेडियापाड़ा में दूर तक फैली सूनी और फटी हुई नंगी जमीन है. यहां घुसते ही हर दो कदम पर मंदिर लगातार हो रहे प्रवचनों की सूचनाएं देने वाले बड़े-बड़े होर्डिंग्स दिखाई देते हैं. स्कूल एख दो ही दिखाई दिए पर शौचायल कहीं भी नहीं थे. यह सच डेडियापाड़ा समेत पूरे गुजरात का है. यहां की अधिकांश महिलाएं विटामिन बी-12 और विटामिन डी की कमी है. धर्मगुरु कहते हैं कि मांस न खाओ जबकि आदिवासी को तो विटामिन बी-12 अपनी मुर्गियों से मिलता है. मेवों की खेती यहां नहीं होती और होती भी तो शायद ये गरीब आदिवासी खा नहीं सकते. इस ब्लॉक में अधिकांश लोग अपनी बुरी हालत की शिकायत नहीं करते. शायद उन्हें पता नहीं कि अधिकार न मिलने पर शिकायत भी की जाती है. एक सज्जन राजू भाई कहते हैं, ‘कौन बोलेगा. भारतीय जनता पार्टी वालो को टिकट चाहिए और बाकी लोग फर्जी मुठभेड़ में हत्या से डरते हैं.’ फरियाद का कोई चक्कर नहीं है. गरीबी का आलम यह है जिसने आदिवासियों को बेटियों को बेचने पर मजबूर कर दिया है. शकुंतला बेन बताती है कि दो साल से उनकी बेटी सुजाता का पता नहीं है. हिना बेन ने उसे बेच दिया. शकुंतला के मुताबिक सुजाता बीमार रहती थी. हिना बेन उसका इलाज करवाने की बात कहकर उसे बहला-फुसलाकर ले गई. सुजाता को अहमदाबाद के मुकामरोजीद गांव में रखा. घरवालों से उशकी बात होती रही फिर बहाने बनाकर बात करवाना बंद कर दिया. पुलिस में शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. पुलिस कहती है कि जेवर और पैसा चाहिए तो चुप रहो.

तंग गली से भीतर मानसिंह का गोबर-मिट्टी से लिपा मकान है. वह कहता है कि उसके परिचित फूल सिंह डरविया, भीमसिंह गामिया, लक्ष्मण डोढ़ा, मगन भाई वसावा, हांदूबेनव बालू, कांतिभाई सभी ने अफनी बेटियां बेची हैं. खरीददार कौन है, पूछने पर पता चलता है कि लड़कियां पटेलों के घर बिकती हैं. क्योंकि पटेलों के यहां लड़कियां नहीं हैं. पता चला कि जिन पटेल लड़कों की उम्र ज्यादा हो जाती है या फिर जो पटेल गरीब होते हैं वही इन्हें खरीदते हैं. कारण कि अगर वो अपनी जाति की लड़की से शादी करेंगे तो इसका खर्च लाखों में आएगा, जबकि यहां 10-20 हजार रुपये में काम हो जाएगा. इस पूरी कवायद में कई दफा लड़कियों के साथ धोखा भी हो जाता है. नई नगरी गांव की राधा बेन की बेटी को सूरत में शादी के लिए लड़का दिखाया गया लेकिन शादी उसके बजाय किसी बूढ़े से करवा दी गई. रमेश भाई नरजी बताते हैं, ‘तड़वी लोग लड़कियां ज्यादा बेचते हैं. मेरे इलाके में लोगों ने लड़कियां 50 हजार रुपये तक में बेची है.’ शादी के बाद लड़कियों को मायके भी नहीं आने दिया जाता. उन्हें डर होता है कि कहीं लड़की के घरवाले लड़की को रख न लें. इस काम में दलाली भी खूब होती है और दलाल भी काफी सक्रिय होते हैं. सोलापाड़ा गांव में शादी के लिए चार लड़कियां बेच दी गई थी. नितिन भाई बताते हैं कि इस इलाके में 24 साल की उम्र के बाद लड़कियों की शादी नहीं होती इसलिए 24 के बाद लड़कियों को कोई ले जाए. स्त्री रोग विशेषज्ञ शांति वासना इसका कारण बताती हैं, ‘स्कूल बेकारों को तैयार कने का कारखाना है. यहां उद्योग, पानी, बिजली कुछ नहीं है. सड़क कंपनियों के लिए बनाई गई है. सरदार सरोवर बांध 32 किलोमीटर पर है, पांच बांध औऱ हैं लेकिन हमारे पास एक बूंद पानी नहीं है. चेकडैम का पैसा पता नहीं कहां गया ? लोग डैम की वजह से विस्थापित हुए, बिछड़े, टूट गए, ऐसे में वो लड़कियां नहीं बेचेंगे तो क्या करेंगे ?’

जैसे गरीब लड़कियां खरीदना गरीब पटेलों की मजबूरी है, वैसे ही लड़कियां बेचना दलित समाज के लिए मजबूरी है. सोरापाड़ा गांव के मजदूर पूंजालाल ने अपनी 20 साल की बेटी नीताबेन की शादी सूरत में पटेल परिवार में की है. डेढ़ एकड़ जमीन के मालिक पूंजालाल बहुत मुश्किल से अपने परिवार का गुजारा करते हैं. अपनी मजबूरी बयां करते हुए कहते हैं, ‘यहां बिजली नहीं, नहर नहीं, सूखा और गरीबी है. ऐसे में लड़कियां पटेलों को न बेचें तो क्या करें, समाज में शादी के लिए एक लाख रुपये चाहिए.’ दलितों के बीच काम करने वाले सामाजिक संस्था नवसर्जन के कार्यकर्ता किरीट मैक्वान बताते हैं कि यह ट्रेंड गुजरात की पूरी आदिवासी पट्टी में है. उत्तर और दक्षिण गुजरात के आदिवासी जिलों से गुजरात के भीतर और बाहर शादी के लिए लड़कियां बेची जा रही है. दक्षिण गुजरात में आदिवासी को दुबड़ा कहते हैं और खरीदी हुई लड़की को दुबड़ी. यहां तक कि गुजरात में बेची गई लड़कियां दिल्ली, मुंई और राजस्थान में देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. सवर्णों के साथ संघर्ष भी चलता रहता है. यहां के दरबार (राजपूत) लोग कई दफा दलितों के मुहल्ले पर हमला कर चुके हैं.

भगवा रंग में रंगे गुजरात में भेदभाव भी चरम पर है. इसकी एक बानगी भी देखने को मिली. 14 अप्रैल को जाशपुर गांव में नवचंडी के यज्ञ में सामुदायिक भंडारा था. दलित कमलेश भाई कहते हैं कि दलितों को अलग रास्ते से ले जाया गया, चारो ओर पर्दा कर कागज की प्लेट पर खिलाया गया. दलतों ने विरोध किया तो दरबारों ने जातिसूचक गालियां दी. विवाद बढ़ा और थाने में दरबारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. नतीजतन दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया. फिलहाल जाशपुर के दलितों का सामाजिक बहिष्कार जारी है. जाशपुर समेत गुजरात के ज्यादातर ग्रामीण इलाकों में दलितों को मंदिरों में घुसने की इजाजत नहीं है. शादी पर वे मंदिर के बाहर से माथा टेकते हैं. दलित शशिकांत कहते हैं कि नाई उनके बाल नहीं काटते हैं. दलित महिलाएं कहती हैं कि उन्हें सब्जी-भाजी नहीं मिल रही. वे आठ किलोमीटर दूर पैदल पादरा जाती हैं क्योंकि ऑटो वाले उन्हें बिठाते नहीं हैं. शादी के दौरान सवर्ण उनपर पत्थर फेंकते हैं. बारात में लैंप लाइट्स औऱ घोड़ा बग्धी नहीं ले जाने देते. पारुल कहती हैं कि स्कूल में दोपहर के भोजन में उन्हें अलग थाली मिलती है जिसपर दो नंबर लिखा रहता है. दलित रमीलाबेन को सवर्णों ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नौकरी से यह अफवाह फैलाकर निकलवा दिया कि उसे टीवी की बीमारी है. यहां तक की दलितों के बच्चे अगर बालों में तेल लगाते हैं तो दरबवार इनके सिर में धूल डाल देते हैं. गांव की दुकानों पर इनके चाय के बर्तन अलग हैं. यहां तक की दाई इनके यहां बच्चा पैदा नहीं कराती. दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अहमदाबाद के किरीट राठौड़ कहते हैं कि उनके छोटे भाई ने पटेल जाति की लड़की से प्रेम विवाह किया. तीन महीने दोनों को गायब रहना पड़ा. पुलिस ने उनके परिवार को खूब तंग किया. किरीट के अनुसार उस लड़की की बड़ी बहन के पति ने अपनी पत्नी को इतना प्रताड़ित किया उसकी छोटी बहन ने दलित के संग भागकर नाक कटा दी है. तंग आकर उसने अपने आठ साल के बच्चे को छोड़ आत्महत्या कर ली. सवाल यह है कि असली गुजरात कौन है, अहमदाबाद की चमचमाती इमारतें, दौड़ती गाड़ियां, चकाचौंध मॉल, अपार्टमेंट, शीशों से ड़ी घाघरा चोलियां, लॉ गार्डन की चहल-पहल या फिर डिडायापाड़ा, पादरा और जाशपुर जैसे इलाके, जहां आदिवासी औरतें बिक रही हैं दलितों के साथ जातिगत भेदभाव चरम पर है.
साभारः आउटलुक के मई अंक से. (संपादित अंश)

Link:
Via Satya Pal Kataria
30/9/2013
http://www.facebook.com/notes/vinod-kumar-bhasker/%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%94%E0%A4%B0%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%9A%E0%A4%B2%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%A6%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%A4-gujraat-/524833310918289

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s