दलित विमर्श और सह आस्तित्व -डॉ देशराज सिरसवाल

Posted: मई 21, 2013 in Dalit Liberation, Dalit Studies, Dr. B.R.ambedkar

dalits

अक्सर ऐसा देखा जाता है की जब भी कोई व्यक्ति किसी विशेष विचारधारा का समर्थक बन जाता है और गहराई से केवल उसी पर एकमात्र चिन्तन करता है तो उसके मन में दूसरी अन्य विचारधाराओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण पैदा हो जाता है.

ऐसा ही कुछ दलित चिंतकों और चिंतन में देखने को मिल रहा है. दलित के दो स्वरूप हमारे सामने आतें है : एक तो जब वह बुराई के प्रति नतमस्तक रहता है और अपने आपको निरीह समझने लगता है. या दूसरा वह स्वरूप जहाँ वह आक्रामक दृष्टिकोण अपना लेता है . आज के संदर्भ में इस पर भी चिन्तन करना आवश्यक हो जाता है की दलित चिन्तन की दिशा क्या हो?

अतिवादिता हमेशा नुकसानदायक होती है चाहे वह किसी विशेष आदत से सम्बंधित हो या विचारधारा से .
आंबेडकर की विचारधारा के प्रति संकीर्ण सोच रखने वाले और वैसा ही प्रचार करने वाले लोग वास्तव में दलित विरोधी ही है . सामाजिक कार्य करने वालों को उनसे बचना चाहिए क्योंकि अगर वह भी इस तरह का दरिश्तिकों रखेंगे तो सहअस्तित्व की अवधारणा समाज में कभी पनप नही सकेगी और दलित हमेशा दलित ही रहेंगे और उनका विकास रुक जायेगा .

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