दलित और हरियाणा की राजनीति – डॉ देशराज सिरसवाल

Posted: अप्रैल 28, 2013 in Dalit Liberation, Dalit Studies
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हरियाणा सरकार लगातार हरियाणा को नंबर वन बताने का दावा करती है पर यह दावा तब फीका पड़  जाता है जब बात दलितों और महिलाओं की सुरक्षा की आती है। हरियाणा में हो रही दलितों पर ज्यादतियों से तो यही लगता है की आज भी हरियाणा उसी युग में जी रहा है जहाँ पर जनजातियाँ और कबीले होते थे। एक कबीला दुसरे कबीलों के लोगो को हमेशा मारने और सताने की कोशिश करता था। हरियाणा में कुछ जातियों का जंगलीपन अभी भी बरकरार है और समय के कुछ अन्तराल बाद दिखता रहता है . हरियाणा सरकार और यहां तक की भारत सरकार भी इनके आगे पंगु और लाचार दिखती है क्यूंकि हरियाणा की राजनीति में इन्ही जातियों के प्रतिनिधि विद्यमान हैं .

पिछले कुछ सालों में हरियाणा में एक विशेष अनुसूचित जाती के लोगो के साथ आगजनी और बलात्कार के मामले हुए , उस जाती के लोगों ने जितना हो सका संघर्ष किया और लगातार कर रहे है , राजनितिक प्रतिनिधित्व की कमी के कारण न तो उन्हें सामाजिक न्याय मिला और उनसे शिक्षा और रोजगार के अवसरों से भी वंचित करने का प्रयाश किया गया, जैसे कैसे वो लोग संघर्ष कर रहे हैं। अनुसूचित जातियों में से एक जाती जो की राजनितिक तौर पे भी और आर्थिक तौर पे भी शासक्त है , ने उनके संघर्ष में नाममात्र का योगदान दिया  जबकि बाबासाहेब  के चितन और संघर्ष को वो आगे पहुँचाने का दावा करते है।

पिछले दिनों उस जाती विशेष के लोगों के साथ भी हरियाणा में वही किया गया जो पहले दूसरी जाति विशेष से किया गया . देखते हैं वे राजनेता जो की इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं कितना इनके संघर्श में साथ देते हैं या वो सिर्फ वर्तमान सत्ता के तलवे चाटने में व्यस्त रहते हैं।

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हरियाणा की राजनीति में दलित प्रतिनिधित्व नाममात्र है , बाबा साहेब के आदर्शों से जो की बहुत दूर है। हरियाणा के दलित नेता अपना और अपने परिवार का पेट भरने में मशरूफ हैं जबकि मुर्ख दलित ये सोचते हैं की आगे जाकर ये इनके तारणहार बनेंगे .  जब तक दलितों में इस तरह का भेद रहेगा उनके घर जलते रहेंगे , बहु बेटियों से बलात्कार होता रहेगा और ये नेता उस समय भी सरकार की के साथ दलितों का सौदा करके अपनी राजनितिक रोटियाँ सेकतें रहेंगे।

जब तक दलित अपने सामाजिक अधिकारों के लिए एकजुट नही होंगे सामाजिक सुरक्षा  के लिए संघर्ष नही करेंगे तब तक राजनितिक और आर्थिक सशिक्तिकरण नही हो सकता . दलित विमुक्तिकरण  तभी संभव हैं जब हम सैधान्तिक रूप से व्यस्क होंगे और यह तभी संभव हैं जब हम अपने महापुरुषों की शिक्षा को समझेंगे और अपने संघर्ष को उनके अनुरूप दिशा देंगे . हमारे तथाकथित नेताओं की सोच से सिर्फ उनका और उनके परिवार का पेट भरेग न की हमे  न्याय मिलेगा और साथ ही इन नेताओं के दोगलेपन के कारण ह़ी कबीलाई लोगों के होंसले बुलंद होते हैं .

जय भीम             जय भारत

डॉ देशराज सिरसवाल

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